किसान ही नहीं हूं मैं


  शीर्षक---किसान
उपशीर्षक------'किसान ही नहीं हूं मैं'

भूमिपुत्र कहलाता धरतीपुत्र मैं,
खुशबू मिट्टी की पहचानता हूँ।
अक्स है इसका मेरे रग-रग में
बू से ही दूर से इसकी जानता हूँ।

चरणामृत है चरण-रज इसकी,
माथे से लगा सदा धन्य होता हूँ।
कमतर न है माँ से कभी यह,
संबल में इसके सदा पलता हूँ।

जन्मभूमि यह बढ़ा साये में इसके,
अब नित नए साँचे में ढलता हूँ।
कर्मभूमि भी यही है मेरी अब,
कर्मपालन निष्ठा से करता हूँ।

कुटुंब है ये सारा संसार मेरा,
यही सोच सदा इसपे मरता हूँ।
नसीब भले न हो पेट की रोटी,
मैं सारे जहां का पेट भरता हूँ।

दशा मेरी कैसी भी हो जहां में,
न मलाल कभी इसका करता हूँ।
फ़रिश्ता हूँ रब का भेजा हुआ,
प्रेम की  फसलें पैदा करता हूँ।

रब न रूठे कभी मुझसे जहां में,
हरदम अब यही दुआ करता हूँ।
राह कैसी भी मुक़र्रर हो मुझे,
नूर-ए-श्रम से नसीब संवारता हूँ।

कलमकार का नाम-
                         अनिल कुमार
                            'निश्छल'

अनिल कुमार 'निश्छल'
शिवनी,कुरारा
हमीरपुर(उ०प्र०)।

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