क्यों दिल बोझिल है
आज
क्यों मंजिल ओझल है
आज
रुख़सत वक्त ने किया है
आज
रुशवत उम्र ने किया है
आज
रूठी है क्यों हमसे जमीं
आज
खल रही है उसकी कमी
आज
सांसे गयीं हैं कुछ थम-सी
आज,
नब्ज़ गयी है थोड़ी जम-सी आज।
उल्फ़त के साए में जी रहा आज
जिंदगी किराए में जी रहा
आज
हरपल इंसां बदल रहा है
आज
एकांत की लत में ढल रहा है
आज
इंसां बन रहा है क्यों हैवान
आज
बहक रहा हर क्यों जवान
आज
फ़ैशनपरस्ती संस्कारों को डुबो रही
आज
हाथों को किसी के लहू से भिंगो रही
आज
'निश्छल' ये सोच व्याकुल है
आज
बन क्यों वतन नहीं जाता गोकुल है
आज
स्वरचित
अनिल कुमार
'निश्छल'
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