गुलिस्तां का पोषण भी
एक अदावत है यारों
हर गुल को गढ़ना भी
एक कलावत है यारों
बाग़बान का हुनर भी
जाया नहीं कभी होता
सदियां गुजारता है ये
धैर्य नहीं कभी खोता
एक उम्र गुजर जाती है
दक्ष कोई भी नहीं होता
भूल भी तजुर्बा देती हैं
पाक कोई भी नहीं होता
कुम्हार घड़े को जब
बार बार ही है गढ़ता
कर्म के दोहराव से ही
हुनर पक्का है होता
बार बार की भूल से ही
वजूद सुधारने का है होता
भूल से सीखता है जो भी
शज़र,हीरा भी वही होता
अनिल कुमार
'निश्छल'
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