क्यों आज धीरज खो रहा है?
धीरज की तू ही तो खान है।
क्यों इतना बेचैन हो रहा है?
तू ही तो खुद की जान है?
क्यों आंखों को भिंगो रहा है?
दिल बहलाने का तू सामान है।
क्यों नसीब पे यूँ ही रो रहा है?
जानवर नहीं तू एक इंसान है।
क्यों लाचार खुद ही हो रहा है?
तेरा दम पे सजा हर मकान है।
क्यों बदजुबान तू हो रहा है?
तेरी रज़ा से राजी ज़ुबान है।
क्यों बदमिजाज भी हो रहा है?
तेरे दम से मन होता शैतान है।
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