शास्त्रों,उपनिषदों ने भी तो
कितना मेरा गुणगान किया है?
साधू,संतो और गुणियों ने भी
तो कितना बखान किया है?
विद्वानों ने भी मुझमें हर देवी-देवताओं की कल्पना की थी।
पूर्वजों ने भी तो कितना मुझे
खुलकर सम्मान दिया था?
कितनी खुश रहती थी! मैं जब ग्वालों संग जाया करती थी।
हठखेली करती दौड़-दौड़ कितने चौक भरा करती थी?
कान्हा की बंसी की प्यारी धुन सुन धन्य मानती थी खुद को।
मनमोहिनी श्याम की छवि देख
भूल जाती थी अपनी सुध को।
आज अपनी दशा पे रात-दिन में आंसू बहाया करती हूं।
किसी तरह खुद का कभी-कभी दिल बहलाया करती हूं।
सोचती हूँ शायद पहले जैसे मेरे भी कभी दिन मेरे भी आएंगे।
जब न रहूँगी मैं तो मनुज भी कभी सिर धुन-धुन पछतायेंगे।
मैं न रही तो दूध,घी,माखन औ घी लोग कहाँ से फिर पाएंगे?
पीढ़ी होगी कमजोर बहुत फिर
रोग भी बहुत हावी हो जाएंगे।
आओ मिलकर "निश्छल" हम सब अब कोई ऐसा काम करें।
माँ माने फिर से गैया को औ
पल-पल मैया का सम्मान करें।
@अनिल कुमार
"निश्छल"
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