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मिट्टी के दिये जलाएँ
Maa Meri
मजदूर
तोताराम
मंजिलें ऐसे ही नहीं मिलीं
क़ीमत तय नहीं करनी पड़ती
कुछ तो है
परिवर्तन सतत है!!
यहाँ औरत होना गुनाह है शायद!!!
असली कुम्भकार पिता
आसमान
छोड़ो भी
मुश्किलें न हरा पायेंगी
नफ़रत मत बाँटो
तोताराम
मिलाते रहिये
जिसका हक उसको नहीं
नफ़रतें बोना छोड़ दो
ग़ज़ल
दोहा ग़ज़ल
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