"इश्क वतन से है"

जाँ निशार करना वतन पे यूँ ही नहीं होता
चमन के इश्क पे फ़िदा होना यूँ ही नहीं होता

दहल जाते हैं यहाँ कायरों के दिल अक्सर
रखवाले वतन के जाँ हथेली पे रख खूं से नहाते हैं
चरणों पे माँ के सजदा करना वतनवालों
राख होकर दफ़न होना यूँ ही नहीं होता

साख पर बात जब मेरे वतन की आती है
दिल में अंगार उठते हैं आंखें नम हो जाती हैं
खूंखार हो जाऊं आग दिल में जगती है
वतन का हमसफ़र होना यूँ ही नहीं होता

नापाक मंसूबे जब मिरे वतन की खातिर
कोई दुश्मन पाले रहता है यूँ ही यहाँ
जिंदा दफ़न कर दें जुबां काट डालें
महबूब-ए-वतन से इश्क यूँ ही नहीं होता

ऐ मौला दुआ "निश्छल" की कुबूल कर ले
मौत मिले जब मेरे वतन की सरहद हो
कफ़न हो तिरंगा ऊँचा शीश गगन हो
वतन की मिट्टी पे दफ़न होना यूँ ही नहीं होता

#मौलिक और स्वरचित
लेखक-अनिल कुमार
          "निश्छल"
   शिवनी,हमीरपुर(उ०प्र०)

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