बहुत याद आती हैं
बचपन की वो बातें
हमें हँसाती हैं सदा
बचपन की वो बातें
नित संग सखा होते
मीठी मुस्कान लिए
ख़्वाब सजाएं सजीले
ऊँचे अरमान लिए
उछल-कूद करते थे
धमाचौकड़ी थे मचाते
सब जब होते परेशान
मार कभी थे खा जाते
रंग-बिरंगी तितलियों
के पीछे दौड़ा करते थे
चोट लगे जब किसी को
आँसू पोछा करते थे
न फ़िक्र थी कोई कभी
न सिकन रहती थी कभी
न किसी से नफ़रत थी
न ही उलझन रहती थी
खुश हो जाते थे हम
यूँ ही अक्सर साथ में
मिलाते थे आवाज जब
एक-दूजे की आवाज में
अब बड़े हो गए हम तो
बड़ी जिम्मेदारियां भी हैं
परिवार की जरूरतें भी
समाज की रीतियां भी हैं
बस कुछ नहीं चाहिए
बचपन हमें लौटा दो
यही दुआ रब से मांगते
हैं हर कदम 'निश्छल' सदा
अनिल कुमार "निश्छल"
अध्यापक
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