खुशियों को चुराएं

आओ जिंदगी के लम्हों से कुछ खुशी के पल चुराएं
वक्त की गुर्बत-ए-नसीब को कुछ पल के लिए भूल जाएं

जिंदगी की जिंदादिली में डुबकी लगाएं
आओ हर लम्हें में खुश होकर उन खुशियों में डूब जाएं
माना कि हर शख़्स चाहता है,हर खुशियां उसे मिल जाएं
आओ कांटों पे ऐतबार कर अग्निपरीक्षा में तप जाएं

जो रश्म-ओ-जिंदगी है उसे तो निभाएं
अपनी भूलों से कुछ तो सीख पाएं
अनुभव को नज़्म-ए-मौशिकी में शामिल करें
फिर हम जिंदगी को जीना सीख जाएं

दिल की धड़कन,नब्ज तेज होना वाजिब है दोस्तों जब मुसीबत आती है तो बताकर नहीं आती
उनसे भिड़ना हमारी रग-रग में समाए
चलो एक बार फिर से कांटों का ताज गले लगाएं

ताज-ए-कांटों से रूबरू होंगें जब हम
तो राह-ए-मुश्किलों से वाकिफ़ होंगें हम
आफ़तें हमको ढालेंगीं एक अच्छे साँचे में
फिर बड़ी से बड़ी आफ़त हमसे दोस्ती का हाथ बढ़ाए

राह की बंदिशें न हमको रोक पाएंगी
राह-ए-मंजिल का भी वो ही पता बतायेंगीं
उनकी उल्फ़त को चलकर दबोच लाएं खुशी से फिर जश्न-ए-जीत को मिलकर हम मनाएं

पर ख्याल ये भी रहे मेरे यारों
राह-ए-जिंदगी आसान नहीं मैदान है संघर्ष का
वही जीतता है यहां पर जिसको मुसीबतों से लड़ना आता है
"निश्छल" कहता है दहाड़कर मिलकर हम
जिंदगी को अपनी असल जिंदगी बनाएं

पूर्णतः मौलिक एवं स्वरचित
अनिल कुमार
"निश्छल"

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