........गतांक से आगे
अटूट बंधन (2)
इधर रवि की माँ ने उम्मीद नहीं तोड़ी थी,बेटे की उम्मीद अभी भी आंखों में चमक बिखेर देती थी।उधर रवि भी माँ को अकेला छोड़ तो आया था,परंतु रवि के मन में भी अजीब और बुरे खयालात आ रहे थे।वह अपने आपको समझा नहीं पा रहा था;करे तो क्या करे?उसको रास्ते भर ऐसा लग रहा था मानों तूफ़ानी और संकुचित बिचारों के बोझ से लदा जा रहा हो।फिर भी वह स्वयं को समझाता हुआ घर की ओर बढ़ रहा था।तभी रास्ते में पड़े एक बड़े पत्थर से टकरा गया,और गिरते-गिरते बचा लेकिन तभी चमत्कार हुआ उसकी अंतरात्मा ने उसको अंदर से झकझोरा कि 'तू इतना नकारा,निर्मम और निष्ठुर कैसे हो सकता है? जिस माँ ने तुझे पैदा किया उसे ही बेसहारा छोड़ दिया।" वो भी भीख मांगने के लिए,ऐसा करने से पहले तुझे चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए था।अरे निष्ठुर!तेरे दिल से आह तक नहीं निकली ,आखिर वह तेरी माँ है,माँ।
झटके से उठा,आंखों से अश्रुधारा की नदी बह निकली थी,मानों कोई कलकल करती नदी मौन भाषा में अपना दर्द बयां कर रही हो।
(खुद को सम्हालते हुए )रवि के कदम पीछे की ओर(माँ की ओर)ज्यादा खींच रहे थे फिर भी पत्नी की बात को याद करते हुए घर की तरफ़ शनै-शनै कदम बढ़ाते हुए घर पहुँचा रात काफ़ी हो चुकी थी पत्नी बाट जोह रही थी,खाना परोस कर लायी लेकिन रवि के हलक से नीचे निवाला नहीं उतरा।बिना खाये ही दोनों बिस्तर में गए।रवि रातभर नहीं सो पाया।नींद आती भी कैसे?छोड़ जो आया था माँ को वक्त और भगवान के भरोसे।
सुबह जगा तो जल्दी से तैयार होकर उसी स्टेशन गया जहाँ अपनी माँ को छोड़ आया था,परंतु बहुत दिन हो गए थे तो माँ का कहीं पता नहीं चला।बहुत मशक्कत की ढूंढने की,परंतु सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए।कर भी क्या सकता था?मन मसोस कर रह गया रवि।और खुद को कोसता रहा कि मैं ही इतना बुरा हूँ कि बिना सोंचे समझे ही माँ को छोड़ आया ।।
अब रोज यही काम करने लगा रवि।जहाँ भी पता चलता वहाँ ढूंढने चला जाता।आज जितना भी रवि के दिल में माँ के प्रति सारा प्रेम उमड़ रहा था।
आखिर माँ से अटूट प्रेम करता था,वो तो बस पत्नी के कहने पर माँ को अपने ही हाथों छोड़ आया था।आज फिर से एक बार माँ-बेटे का अटूट बंधन टूटने के लिए तैयार नहीं था।
पूर्णतः मौलिक एवं स्वरचित
अनिल कुमार
"निश्छल"
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