........गतांक से आगे
अटूट बंधन--(अंतिम क़िस्त)
रवि का दिल पानी-पानी हो रहा था।खुद को लज्जित महसूस कर रहा था।पर करे भी तो क्या?समय को कुछ और ही मंजूर था।इतना सबकुछ होने के बाद भी रवि ने अपनी पत्नी कुसुम से कुछ नहीं कहा ।न ही उसे डाँटा, फटकारा, न उसे अहसास दिलाया कि गलती उससे भी हुई है।ख़ैर,वह हर बार मन मसोस कर रह जाता था।आज सुबह जगा तो अचानक से उसे ऐसा लगा जैसे उसकी माँ घर लौट आयी है,पर जैसे ही बिस्तर से उठकर देखता है तो केवल उसका वहम साबित होता है।रवि बिस्तर छोड़ देता है और झटपट तैयार होकर आज आंखों में उम्मीद समेटे निकल पड़ता है अपनी माँ को खोजने।आख़िर अटूट प्यार जो था अपनी माँ से। रास्ते में चलता हुए रवि के दिल में अनेक विचारों का तूफानी दरिया हिलोरें मार रहा था।कभी खुद को सुन्न पाता,तो कभी ख़ुद को समझाता यही सिलसिला चलता रहा।आखिर मंजिल आ चुकी थी।और ढूंढना,पूँछना चालू कर दिया।कई जगह पता किया परन्तु निराशा हाथ लगी।रवि आज घर से बिन बताए सोचकर आया था कि माँ को ढूंढकर ही मानूँगा।अभी भी रवि के दिल में उमीदों की किरणें अपनी रोशनी से रवि की हिम्मत बढ़ाए हुए थीं।तभी उसे लगा चलो आसपास और पता कर लूं शायद कहीं पता चल जाए।रवि आसपास पता करता है तो एक मंदिर के बाहर का दृश्य देखकर अवाक रह जाता है,उसकी माँ फटे, पुराने चीथड़ों में खुद को लपेटे हुए अपने खाने के लिए भीख मांग रही थी,रवि की आंखों से आँसुओं की धारा बह निकली।फिर भी जैसे तैसे खुद को समझाया और पास जाता है,और अपनी माँ के पास बैठकर सारी बातें पूछता है।रवि की माँ सारा वाकया बताती है।रवि अपनी माँ को वहां से ले जाकर एक वृद्धाश्रम में पहुँचता है।वहाँ के मालिक को सबकुछ बताता है और सारी व्यवस्थाओं का प्रबंध करने के लिए बोलता है।अभी भी रवि की हिम्मत नहीं हुई थी कि सारी कहानी अपनी माँ को सच-सच बता दे।करता भी क्या?अगर बताता है तो उसकी माँ टूटकर बिखर जाएगी।यही सोचकर नहीं बताता है।और उसी वृद्धाश्रम में छोड़ देता है।वृद्धाश्रम के मालिक से अपनी माँ के लिए अतिरिक्त व्यवस्था की वकालत करता है।ख़ैर अब माँ चैन और सुकूँ से रह रही थी।रवि का अब रोज का आना जाना हो गया था।कुछ देर तक अपनी माँ के पास बैठता,बाटे करता तो उसे ऐसा लगता जैसे सारे जहाँ की खुशी मिल गयी हो।यही सिलसिला चलता रहा आज रवि को ग्लानि नहीं थी। ख़ुद को समझाता।माँ की ममता में बह जाता,माँ ने एक दिन पूँछ लिया बेटा तू अपने घर कब ले चल रहा है मुझे।माँ के इतना कहते ही रवि की आँखे भर आयी थीं।फिर खुद को संभालते हुए बोलता है बहुत जल्द,बहुत जल्द बस कुछ दिनों की तो बात है,ले चलूँगा आपको घर।रवि ने अभी भी अहसास नहीं होने दिया था कि वह(रवि) ही उसका बेटा है।करता भी क्या?रवि के पास भी कोई उपाय नहीं था।ख़ैर आँख मिचौली चलती रही।काफी दिन बीत गए।एक दिन रवि ने अपनी पत्नी से सारी बात बतायी और पूँछा," क्या माँ को घर ले आऊँ?" कुसुम का मन भी ग्लानि से भर चुका था।और कुसुम ने हामी भर दी फिर क्या था?रवि अपनी माँ को घर ले आया।और पूरी बात बताई।रवि और कुसुम दोनों ने मिलकर माफ़ी मांगी।माँ ने दोनों को माफ कर दिया आखिर माँ का दिल ही पिघल जाता है,अपनी संतानों की आंखों में आँसू देखकर।ख़ैर अब रवि माँ के आँचल में सिर रखकर बहुत रोया।सारी ग्लानि आंखों से बह निकली थी,उसे गलती का पश्चाताप हो रहा था।आखिर झगड़ा ही तो किया था और निकाल फेका एक मक्खी के माफ़िक।रवि की माँ ने रवि को समझाया उसे चुप कराया।आखिरकार आज भी अटूट बंधन ही तो था।जिसमें बंधे हुए थे दोनों,माँ और बेटे।अंत में सारे लोग खुशी-खुशी रहने लगे कुसुम माँ की रोज सेवा-सुश्रुषा करने लगी।रवि और कुसुम माँ की सेवा करते और अपने को धन्य समझते बस यही सिलसिला चलता रहा।
शिक्षा-आवेश में आकर माँ-बाप को वक्त के सहारे न छोड़े,वृद्धाश्रम में न छोड़े ,जब तक जिंदगी है माँ-बाप की सेवा जरूर करें।।
मौलिक एवं स्वरचित
अनिल कुमार
"निश्छल"
शिवनी,कुरारा
हमीरपुर(उ०प्र०)
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