"हम बदलें तो कैसे?''

वक्त से संभल के हम जितना चले,
वक्त की आंखों में हम खलते रहे।

वक्त ने पलटी मारी जब भी कभी,
वक्त के साथ हम भी ढलते रहे।

आए कई और खो गए जहां में,
लोग किस कदर ख़ुद ही बदलते रहे?

जो भी;जिसने भी;वादे किए थे,
वादों से वो अक्सर मुकरते रहे।

लाज़मी था कि वक्त पे हम संभल जाएं,
अपना समझ हम साथ चलते रहे।

दुःखती रगों की तो बात ही अलग है,
ज़ख्म देकर नए वो मसलते रहे।

"निश्छल'' की फ़ितरत ही कुछ ऐसी है,
जो भी आया गले हँसके मिलते रहे।

©अनिल कुमार
"निश्छल''
शिवनी,कुरारा
हमीरपुर(उ०प्र०)

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